Bharate Bhatu Bharati

Sunday, December 21, 2008

सिकंदर की हार

कलि संवत ३०२४ में सिकंदर और दारा की अन्तिम लडाई गोगामढ़ी में हुई जिसमें दारा हार कर भागा पर अपने ही सैनिकों द्वारा मार डाला गया। सिकंदर ने बहावलपुर और पेशावर पर कब्ज़ा कर लिया। जसके बाद सिकंदर कांगडा पहुँचा और काँगड़ा की राजकुमारी से विवाह कर लिया। काँगड़ा से मारकंडा शाहपुर होता हुआ सिकंदर दिल्ली पहुँचा ।


इस समय पाटलिपुत्र में सम्राट समुद्रगुप्त का शासन था । समुद्रगुप्त के आठ पुत्र आठ प्रान्तों में शासक नियुक्त थे। चित्तौड़ गढ़ में उनके ज्येष्ठ पुत्र रामगुप्त का शासन था।

रामगुप्त की रानी ध्रुवदेवी विश्वविख्यात सुंदरी थी। उसे पद्मावती भी कहा जाता था। रामगुप्त की राजसभा में पंडित राघव चेतन ज्योतिष और राजनीति का विद्वान् था। एक दिन जब राजा रामगुप्त और रानी पद्मावती अपने कक्ष में बैठे हुए थे तो अचानक राघव चेतन बिना आज्ञा लिए अंदर आ गए। रामगुप्त नाराज हो गए और अगले दिन उन्होंने भरी सभा में अपमानित करके देश निकाला दे दिया। राघव चेतन चित्तौर गढ़ से निकल कर सीधे दिल्ली पहुँचा। जहाँ उसने अलावादीन सिकंदर से मुलाकात की। और सिकंदर की सभा का सदस्य बन गया। मौका पाकर राघव चेतन ने पद्मावती की सुन्दरता की चर्चा की। और सिकंदर को उकसाया की वह चित्तौर पर चढाई करे । सिकंदर पद्मावती को पाने के लिए बेचैन हो गया और अपनी सेना लेकर चित्तौर की और कूच कर दिया। चित्तौर गढ़ में भी युद्ध की तैयारियां होने लगी। कुछ ही दिनों में सिकंदर चित्तौर पहुँच गया और गढ़ को चरों तरफ़ से घेर लिया। लेकिन चित्तौड़ गढ़ को भेदना आसान नहीं था। कई महीनों तक भी जब गढ़ को भेदने में सिकंदर असफल रहा तो वह बेचैन हो उठा। उसने राघव चेतन से सलाह की। राघव चेतन ने कहा, रक्षा बंधन का पर्व आने वाला है, और इसका लाभ उठाकर तुम कहला भेजो की तुम पद्मावती को अपनी बहिन मानते हो और इस पर्व पर भेंट देना चाहते हो। राजा रामगुप्त ने सिकंदर के प्रस्ताव को राजसभा में रखा। अधिकतर सभासद इसे एक धोका मानते थे और सिकंदर के प्रस्ताव को मानना नहीं चाहते थे। परन्तु कुछ ने इस प्रस्ताव को युद्ध समाप्त करने का अच्छा अवसर मानकर इसे स्वीकार करने का तर्क दिया। अंत में राजा रामगुप्त ने प्रस्ताव मान लिया और अलावादीन सिकंदर का किले में स्वागत किया गया। लेकिन रानी पद्मावती ने सिकंदर के सामने आने से मना कर दिया। सिकंदर ने कहा मैं अपनी बहिन का सम्मान किए बिना कैसे जा सकता हूँ। राघव चेतन ने प्रस्ताव दिया की यदि पद्मावती सामने नहीं आना चाहती तो सिकंदर शीशे में ही उसे देख कर उसका सम्मान कर देगा। इस बात पर राजा रामगुप्त ने पद्मावती को राजी करलिया। पद्मावती को दर्पण में देखकर सिकंदर भौचक रह गया और मन ही मन ठान लिया कि पद्मावती को पाकर रहेगा। सिकंदर वापस जाने कि तैयारियां करने लगा। सिकंदर और उसके साथियों को बाहर तक छोड़ने राजा रामगुप्त उनके साथ गए। पर बाहर पहुँचते ही सिकंदर ने राजा को बंदी बना लिया और अपने साथ ले गया। राजपूत धोका खा गए।

रामगुप्त को यातनाएं दी जाने लगीं। सिकंदर ने मांग की कि पद्मावती उसे सौंप दी जाए। उधर चित्तौड़ गढ़ में मन्त्रनाएँ होने लगी कि राजा को कैसे छुड़वाया जाए। रामगुप्त का छोटा भाई चन्द्रगुप्त जो उस समय केवल १२ वर्ष का था, बोल उठा "सिकंदर ने हमसे कपट किया, हमें भी कपट का सहारा लेना चाहिए।" चन्द्रगुप्त ने सुझाव दिया कि चुने हुए सैनिकों को स्त्रीवेश में भेजा जाए। चन्द्रगुप्त ने स्वयं रानी पद्मावती के छद्मवेश में शत्रु के खेमे में पहुँच कर शत्रु को मार डालने का प्रस्ताव किया। चन्द्रगुप्त का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। सिकंदर को कहला भेजा गया कि रानी पद्मावती अपनी ५०० सखियों के साथ आयेगी और पहले राजा रामगुप्त से मिलेगी और फिर सिकंदर के खेमें में जायेगी। ५०० पालकियां सजाई गयीं। हरेक पालकी में एक युवा वीर को स्त्रीरूप में बिठाया गया। हरेक पालकी को उठाने वाले आठ कहार भी वीर सैनिक थे। चन्द्रगुप्त रानी पद्मावती के वेश में पालकी में बैठा। सिकंदर के घेरे में पहुँच कर सबसे पहले चन्द्रगुप्त की पालकी को राजा रामगुप्त के पास ले जाया गया। रामगुप्त को छुड़वा कर किले की ओर भेज देने के बाद चन्द्रगुप्त की पालकी को सिकंदर के खेमे में ले जाया गया। बाकि की ५०० पालकियां भी सिकंदर के ५०० सरदारों के खेमों में भेज दी गयीं। जैसे ही सिकंदर ने चन्द्रगुप्त को पद्मावती समझ कर उसका हात पकड़ना चाहा, चन्द्रगुप्त ने छुरे से वार कर दिया। और शंख बजा दिया। बाकि ५०० युवाओं ने भी ५०० सरदारों पर धावा बोल दिया। मारकाट मच गई और भयंकर युद्ध छिड़ गया। सिकंदर के बहुत सारे सरदार और सैनिक शराब के नशे में मारे गए। चन्द्रगुप्त स्वयं अपने घोडे पर भाग निकले। उनका पीछा किया गया। परन्तु घोडे को दौड़ते हुए वह किले के पास के जंगल में घुस गए। बुरी तरह से थक जाने के कारण वह पसीने से तर थे। और एक पेड़ के निचे गिर कर बेहोश हो गए। कुछ देर में एक शेर उस तरफ आया। शेर ने चन्द्रगुप्त का शरीर सूंघा और उसके पसीने को चाट कर चला गया।

चन्द्रगुप्त ने अपने राजा कि रक्षा की और पद्मावती के सम्मान को बचाया। यही चन्द्रगुप्त बाद में चन्द्रगुप्त मौर्य चक्रवर्ती सम्राट बना। उसने विक्रम संवत की स्थापना की। कलिंग युद्ध के बाद उसने अपना नम अशोक रख लिया।

Saturday, December 13, 2008

SONIA - A DANGER FOR INDIA

By François Gautier 02 Dec 2008 02:37:00 AM IST
Sonia’s presence in Delhi is costing India dearly. In 1898, the French writer Emile Zola wrote an open letter to the then French president in the newspaper L’Aurore, titled j’accuse (‘I accuse’), where he accused the French government of anti- Semitism towards Captain Alfred Dreyfus, a Jewish officer unfairly condemned for treason.Now it is time for the people of India to say openly that which many, including within the Congress, think secretly and may utter in the privacy of their chambers.It is not about Manmohan Singh, it is not even about Shivraj Patil, the fall guy; it is about that one person, the Eminence Grise of India. She who pulls all the strings, She whose shadow looms menacingly over so many, She who holds no portfolio, is just a simple elected MP, like 540 others, but rules like an empress.Sometimes, one’s very physical presence at the top is enough to move things, to influence the course of events. One word from Her, a glance, a frown, are enough to put the whole heavy, inert, unwilling machinery of India’s bureaucracy and political system in full motion. Sometimes She need not say anything: in the true tradition of Bhakti, Her ministers, Her secretaries, interpret Her silences and rush to cater to Her western and Christian identity.Nevertheless, she has said and acted enough so that one day she may stand accused on the pages of History for what she must have done to India.I’accuse Sonia Gandhi as being responsible for the tragedy of Mumbai, having emasculated India’s intelligence agencies by stopping them from investigating terror attacks in the last four years, including the Mumbai train blasts. She has also neutralised the ATS by ordering them at all costs to ferret out ‘Hindu terrorism’, which if it exists, has wrought minuscule damage compared to what Islamic terror has done since 2004. Did the US send a warning to India that there may be an attack on Mumbai and that the Taj would be one of the targets? Were these ignored because the ATS was too busy chasing Hindu ‘terrorists’ on Sonia’s orders? I accuse Sonia and her government of having made the NSG the laughing stock of the world. How many times did the NSG (who took ten hours to reach Mumbai) claim that it had “sanitised the Taj and that the operation was over” and how many times did a bomb go off immediately after? For the last 20 years, the NSG has guarded VIPs and has become soft.See the comments of Israeli terror specialists, who said the NSG should have first sanitised the immediate surroundings of the places of conflict, kept the bystanders and press (who gave terrorists watching TV in the Taj rooms a perfect report of the security forces’ whereabouts) out of the place, gathered enough information about the position of the terrorists and hostages before taking action, instead of immediately engaging the terrorists, and ensuring the deaths of so many hostages.I accuse Sonia of having let her Christian and Western background, in four years, divide India on religious and caste lines in a cynical and methodical manner.I accuse Sonia of weakening India’s spirit of sacrifice and courage, so that 20 terrorists (or less) held at ransom the financial capital of India for more than three days.I accuse Sonia Gandhi of always pointing the finger at Pakistan, when terrorism in India is now mostly homegrown, even if it takes help, training, refuge and arms from Pakistan; of not warning Indians of the grave dangers of Islamic terror for cynical election purposes.I accuse Sonia of being an enemy of the Hindus, who always gave refuge to persecuted minorities, and who are the only people in the world to accept that God may manifest under different names, in different epochs, using different scriptures.I accuse Sonia Gandhi of taking advantage of India’s respect for women, its undue fascination with the Gandhi name, and its stupid mania for White Skin.I’accuse Sonia of exploiting the Indian Press’ obsession with her. She hardly ever gave interview in 20 years, except scripted ones to NDTV, yet the Press always protects her, never blames her and keeps silent over her covert role.I’accuse Sonia and her government of trying to make heroes of subservient and inefficient men to hide the humiliation of Mumbai 26/11. Before going to his death, Hemant Karkare, the ATS chief, was shown on television clumsily handling his helmet, as someone who uses it very rarely. Why did he die of bullet wounds in the chest when he was wearing a bullet-proof vest? Either Indian vests are inferior quality or he was not wearing one.How did the terrorists who killed him and his fellow officer escape in the same vehicle used by the ATS chief ? Why did he and his officers go into Cama Hospital without ascertaining where the terrorists were? We honour his death, but these facts say a lot about the ATS’ battle-readiness.Will someone in the Congress, someone who feels more Indian than faithful to Sonia, stand up and speak the truth? Who said, “Go after Hindu terrorists”? Who insisted on putting pressure on BJP governments in Karnataka or Orissa for so-called persecution of Christians, when Christians have always practised their faith in total freedom here, while their missionaries are converting hundreds of thousands of innocent tribals and Dalits with the billions of dollars given by gullible westerners? Who said, “Go soft on Islamic terrorism”? Who wants to do away with India’s nuclear deterrence in the face of Pakistani and Chinese nuclear threats, by pushing at all costs the one sided Indo-US nuclear deal, which makes no secret of its intention to denuclearise India militarily? I am sure Sonia Gandhi has good qualities: she probably was a good wife to Rajiv, a good daughter in law to Indira and by all accounts, she is a good mother to her children. One also hears first-hand reports about her concern for smaller people, her dignity in the suffering that befell her when her husband was blown to pieces, and her courtesy with visitors.Nevertheless, she is a danger to India.Her very presence, both physical and occult, open the doors to forces inimical to India. Even Indian Christians should understand that she is not a gift to them: her presence at the top has emboldened fanatics like John Dayal or Valson Thampu, who practise an orthodox Christianity prevalent in the West in the early 20th century, but no longer, to radicalise their flock. Indian Christians should recognise that they have a much better deal here than Christians or Hindus have in Pakistan, Bangladesh, Indonesia or Saudi Arabia.Under Sonia’s rule, Indian Muslims, too, have been used as electoral pawns. They have been encouraged to shun the Sufi streak, a blend of the best of Islam and Vedanta, for a hard-line Sunni brand imported from Saudi Arabia, Pakistan and Afghanistan.For the good of India, her civilisation, her immense spirituality and culture, Sonia Gandhi has to go and a government that thinks Indian, breathes nationalism and will protect its citizens must be voted to power

12 steps to shock-and-awe Pakistan’s economy

R Vaidyanathan
December 11, 2008
I did not anticipate the huge response my inbox received for the article slamming Pakistan. Many of those who wrote in have sought concrete steps to tackle the Terror Central.
The terror attack on world citizens at Mumbai has created revulsion and outrage all over the world. It is imperative that India seize the opportunity provided to destabilise Pakistan.
A stable Pakistan is not in the interest of world peace, leave alone India. Army controls the country and owns its economy.
A significant portion of its GDP is due to army-controlled entities (See: Military Inc - Inside Pakistan’s Military Economy, by Ayesha Siddiqa; OUP; 2007). One can easily say that Pakistan economy and its Army/ISI are synonymous.
Unless this elementary fact is internalised, we are not going anywhere. This implies we should stop talking of a stable Pakistan since a stable Pakistan means multiple attacks on many more cities of India by that rogue organisation ISI, which is the core of the Pakistan Army and the heart of Pakistan’s economy.
Let us not even assume that Zardari is in control. Poor man — he did not trust his own investigators to probe his wife’s assassination — he wanted Scotland Yard to do the job. Now he blabbers that if his investigators are satisfied, then he will initiate action against terrorists sitting inside Pakistan.
Periodically, the Pakistan Army likes to present some useful idiots (as Lenin would have called them) as elected representatives and we swoon over such events.
India should take the following steps to destabilise the economy of Pakistan:
1. Identify the major export items of Pakistan (like Basmati rice, carpets, etc) and provide zero export tax or even subsidise them for export from India. Hurt Pakistan on the export front.
2. Identify the major countries providing arms to Pakistan and arm twist them. Tell Brazil and Germany (currently planning to supply massive defense items to Pakistan) that it will impact their ability to invest in India. Tell Germany that retail license to Metro will be off and other existing projects will be in jeopardy.
3. Incidentally, after the arrival of Coke and Pepsi in China, the human rights violations of China are not talked about much by US government organs. Think it is a coincidence? Unless we use our markets to arm-twist arms exporters to Pakistan, we will not achieve our objectives.
4. Tell American companies that for every 5% increase in FDI limit for them, their government needs to reduce equipping Pakistan by $5 billion. That is real politics, not whining. Let us remember that funds are in desperate search of emerging markets and not the other way about. Let us also remember that international economics is politics by another name.
5. Create assets to print/distribute their currency widely inside their country. To some extent, Telgi types can be used to outsource this activity. Or just drop their notes in remote areas.
6. Pressurise IMF to add additional conditionality to the loans given to them or at least do not vote for their loans.
7. Create assets within Pakistan to destabilise Karachi stock market - it is already in a shambles.
8. Cricket and Bollywood are the opium of the Indian middle classes. Both have been adequately manipulated/ controlled by the D-company since the eighties. Chase the D-company money in cricket/ Bollywood and punish by burning D-assets in India instead of trying to have them auctioned by the IT department when nobody comes to bid for it.
9. Provide for capital punishment to those who fund terror and help in that. We have the division in the finance ministry to monitor money laundering, etc. It is important that terror financing is taken seriously and fully integrated into money laundering monitoring systems and this division is provided with much larger budget and human resources. And it should coordinate with RAW.
10. Encourage and allow scientists/ academicians/ elites of Pakistan to opt for Indian passport and widely publicise that fact since it will hurt their self-respect and dignity. There will be a long queue to get Indian passports — many will jump to get our passport — since they will not be stopped at international airports. It is rumoured that Adnan Sami wants one. Do not give passports to all — make it a prized possession. Let it hurt the army- and ISI-controlled country. This one step will destroy their identity and self-confidence.
11. Discourage companies from India from investing in Pakistan, particularly IT companies, till Pakistan stops exporting its own IT (international terrorism).
12. In all these, it is important that we do not bring in the domestic religious issues. The target is the terror central, namely Pakistan, and if there are elements helping them here then they also should be punished — irrespective of religious labels. If Pakistan is dismantled and the idea of Pakistan is gone, many of our domestic issues will also be sorted out.
Will the Indian elite go for the jugular or just light more candles and scream at the formless/ nameless political class before TV cameras?
It is going to be a long haul and may be in a decade or so, we can find a solution to our existential crisis of being attacked by barbarians from the West. We need to combine strategy and patience and completely throw to the dustbin the ‘Gujral Doctrine’ by that mumbling prime minister about treating younger brothers with equanimity. The doctrine essentially suggests that if we are slapped on both the cheeks we should feel bad that we do not have a third cheek to show.
He, according to security experts, seems to have dismantled our human intelligent assets inside Pakistan, which has resulted in the gory death of thousands of Indian citizens in the last few years.
Such is our strategic thinking in this complex world since our political class is not adequately briefed and the elite don’t think through issues. Better to be simple in our talks and vicious in our actions rather than the other way.
Hopefully, this November attack will create a new vibrant India capable of taking care of its own interests.
The author is professor of finance and control, Indian Institute of Management-Bangalore, and can be contacted at vaidya@iimb.ernet.in. The views are personal and do not reflect those of his organisation.

Wednesday, December 26, 2007

गुजरात चुनाव की सीख

॥भारते भातु भारती ॥

गुजारात में नरेन्द्र मोदी नें सभी विरोधियों को एकसाथ पटखनी दी । इन विरोधियों में अपने आप को धर्म निरपेक्ष कहलाने वाले नेता जो मुसलमानों में रोष और उन्माद पैदा करके दंगे कराने को उत्सुक थे, सफल नहीं हो पाए । इन नेताओं का साथ दिया अंग्रेजी मीडिया नें । पर सभी प्रकार का अपप्रचार करने पर भी इनकी दाल नहीं गल पाई और नरेंद्रभाई के सामने उन्हें नतमस्तक होना पड़ा । इसके अतिरिक्त जेहादी और इसाई तत्वों ने भी सब प्रकार से विरोध करने का प्रयास किया । परन्तु सबको मात खानी पड़ी । आखिर नरेन्द्र मोदी में ऐसी क्या विशेषता थी जिसके कारण यह चमत्कार हो पाया ।

१. खतो नथी खावा देतो नथी : मैं न खाता हूँ न खाने देता हूँ । चुनाव के समय केवल एक बार मोदी ने यह कहा और यह वाक्य जनता में स्वीकृत हुआ क्योंकि जनता इस बात को पिछले पांच साल देख चुकी थी । इस वाक्य में छिपी है गुजरात की भ्रष्टाचार से मुक्ति की गाथा। कहा जाता है की भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की ओर फैलता है । जिसका अर्थ है भ्रष्टाचार का उपचार भी ऊपर से ही शुरू होता है। जब मुख्य मंत्री स्वयं भ्रष्ट नहीं होगा तो प्रशासन भी भ्रष्ट नहीं हो पायेगा। मोदी के प्रशासन की प्रशंसा आम आदमी ने भी की और व्यापारी तथा उद्योगपति ने भी की। मोदी की सफलता का यह प्रमुख कारण माना जा सकता है।

२. गुजरात की अस्मिता : मोदी कभी हिन्दू-मुस्लिम कि बात नहीं करते । न हीं जाति की राजनीती करते हैं । और न हीं कभी किसी जाति विशेष के लिए किसी छूट की बात करते हैं । मोदी केवल गुजरात और गुजराती अस्मिता की बात करते हैं । गुजरात और गुजराती में सब लोग आ जाते हैं । और इस प्रकार सबको एक सूत्र में बांध देतें हैं । पंथ और जाति की बात करने की आवश्यकता ही क्या है। यही सच्ची पंथ निरपेक्षता भी है ।

३. बिजली ,पानी और सड़क : गुजरात में २४ घंटे बिजली उपलब्ध है. कृषि के लिए पानी उपलब्ध है। बढिया सड़कें बन गयी हैं। विकास के लिए जिन मूलभूत साधनों की आवश्यकता है वह उपलब्ध हैं। प्रदेश का विकास आम आदमी के सामने है। जैसा पहले कभी नहीं हुआ। सब और समृद्धि दिखाई दे रही है। गुजरात का गौरव बढ़ रह है। लोग प्रसन्न हैं।

४ . जीतेगा गुजरात : मोदी ने गुजरात को जिताने का आह्वाहन किया। स्वयं को पीछे रखा और गुजरात को आगे। गुजराती अस्मिता को प्राथमिकता दी। गुजरात के स्वाभिमान को जगाया। और इस प्रकार गुजरातियों के मन मस्तिष्क पर छा गया।

Tuesday, December 25, 2007

Jesus Christ - the year of Birth

The use of the Christain calendar did not begin in 1 A.C.E. In fact the epoch was fixed by Dionysius Exiguus in 525 A.C.E. The Christian Era did not become general in Europe until the 11th century. The length of the year was taken as 365 ¼ days. In 1582 Pope Gregory ordered a reform of the calendar adopting the year of length 365.2425 which closely approximates the tropical year of 365.2422 days. In the new calendar a century year was not a leap year unless divisible by 400. Thus years 100, 200, 300 were not taken as leap years. To correct the accumulated error till 1582, 10 days were dropped. This figure of ten days is telling. If the correction was to be made from 1A.C.E. then 15 century years would have occurred out of which only three (400,800,1200) would be leap years. The correction therefore, should have been of 12 days. Why were only 10 days dropped? Some have tried to argue that the correction was made from the date of the first council of Nicaea (325 A.C.E.). But this argument is not convincing. For the Church, Date of Christ's birth would be of prime importance and the reckoning ought to begin from that date. Besides between 325 and 1582 there are 12 century years out of which three would be leap years, the correction therefore, should have been of nine days. Since the correction made was of ten days, the base year was in the third century. It is significant that earlier, the Church used an epoch from 282 A.C.E. and it seems most likely that the correction was made from this year. This is also evident from the fact that the year of correction was 1582 exactly 1300 years from the epoch. It would be therefore, reasonable to conclude that, since the year of Christ's birth was of prime importance to the Church, this year 282 was in fact the year of his birth.

मोदी की पंथ निरपेक्षता

अंग्रेजी चैनल मोदी को सांप्रदायिक और मुस्लिम विरोधी कहते नही थकते । परन्तु मोदी के वक्तव्यों को यदि देखा जाय तो निष्कर्ष इसके विपरीत निकलता है । मोदी कभी हिन्दू-मुस्लिम कि बात नहीं करते । न हीं जाति की राजनीती करते हैं । और न हीं कभी किसी जाति विशेष के लिए किसी छूट की बात करते हैं । मोदी केवल गुजरात और गुजराती अस्मिता की बात करते हैं । गुजरात और गुजराती में सब लोग आ जाते हैं । और इस प्रकार सबको एक सूत्र में बांध देतें हैं । यही सच्ची पंथ निरपेक्षता है ।

राष्ट्रिय स्तर पर भी इस नीति को अपनाने की जरूरत है । हमें भारतीयता के सूत्र में सबको बांधने की जरूरत है । हम पहले भारतीय हैं फिर कुछ और । जाति और पंथ की बात करने की जरूरत ही क्या है । केवल भारतीयता की बात करें । यही पंथ निरपेक्षता है और यही राष्ट्रवाद है । जय हिंद ।

Saturday, December 22, 2007

भूगोल में राम

भूगोल में राम

इतिहास में कुछ अत्याचारी शासकों ने स्थानों के नाम जबरदस्ती बदल कर उनमें अपना नाम जोड़ दिया जैसे सिकंदर से सिकन्दरा, औरंगजेब से औरंगाबाद, अहमद से अहमदाबाद । कुछ ने जतिवाचक नाम दे दिए, जैसे पाकिस्तान में हिन्दुबाग से इस्लाम्बाग। परन्तु कुछ ऐसे भी शासक हो गए हैं जिनका नाम लोगों ने स्वेच्छा से अपना लिया और अपने नगर या ग्राम का नाम उस शासक के नाम पर रख दिया. राम ऐसे ही रजा थे जिनकी ख्याति विश्व भर में फैली हुई थी और उनके नाम से कई नगरों और गाओं के नाम सुशोभित किये गए. विश्व भर में फैले इन भौगोलिक नामों का संक्षिप्त विवरण यहाँ देखेंगे.

भारत में तो ४०० से अधिक ऐसे स्थान हैं जिनके नाम के साथ राम का नामजुडा है । अन्य देशों में राम के नाम के साथ बने भौगोलिक नामों का हम अवलोकन करेंगे . कोष्ठक में दिए गए अंक देशांतर (पूर्व) और अक्षांश (उत्तर) के हैं।

१. पाकिस्तान में : पाकिस्तानी सरकारोंने यद्यपि इसलाम के नाम पर कई भौगोलिक नामों को बदल दिया फिर भी राम के नाम से जुडे कई स्थान अज भी मिलते हैं. जैसे, रामदासपुर (७३ , ३०.२५ ), रामगढ़ (७२ , ३०.२५ ), रामचौत्र (७२ , ३०.५ ), रामदिअना (७३ , ३२ ). कोट पैरा राम (७२.५ , ३२.२५ ), राम दिवाली (७३ , ३१.५ ), राम किशन (७२ , ३४ ), रामकली (७१ , ३० ), रामलछ्मन (७३ , ३१ ), रामनिवास (७३ , ३०.५).

२. अफगानिस्तान और इरान : अफगानिस्तान और इरान में भी कई स्थान नाम राम के नाम से संबंधित हैं। जैसे राम देल काले (अफगानिस्तान ६३,३२.५), राम हुर्मोज़ (इरान ५०,३१), राम शहर (इरान ४९,३१), राम सर (इरान, ५१,३७).

३. मध्य पूर्व : राम अन्दन (सीरिया ३७,३७), राम अल अन्ज़ (सीरिया ३७,३४.७५), राम (लेबनान ३६,३४.२५), राम अल्लाह (इस्रायल ३५,३२), राम ओन (इस्रायल ३७,३२.५).

४. सर्बिया : राम (२२,४५).

५. कनाडा : राम नदी (-११०,६२).

६. बंगला देश : राम गोपाल पुर (९१,२४.५), रामकृष्णपुर (९०,२४.५), रामकृष्णपुर (२) (८९,२४), रामचन्द्रनगर (९१,२४.७५), रामनारायाणपुर (९१,२३).

७. म्यांमार (ब्रह्म्देश) : राम देनी (९३,१८), राम देव (९२,१८.२५),

८. मंगोलिया : राम कुरेसुमु (गोबी)

९. पपुआ : राम (१४८, -५)